व्यापकत्वे शत्रुदेहं स्वं भ्रमन्तं विचिन्तयेत् ।
विद्रुतं करभारूढं विश्वमुचाटितं भवेत् ॥७३॥
vyāpakatve śatrudehaṃ svaṃ bhramantaṃ vicintayet |
vidrutaṃ karabhārūḍhaṃ viśvamucāṭitaṃ bhavet
व्यापकता (की अवस्था) में शत्रु के शरीर को अपना (मानकर) भ्रमण करता हुआ, विद्रुत (भागता हुआ), करभ (ऊँट) पर आरूढ़ चिन्तन करे; (तब उसका) समस्त (अस्तित्व) उच्चाटित (निष्कासित) हो जाएगा (— यह उच्चाटन-कर्म है)।