The Vision of Śiva· 7.73 / 122

The Vision of Śiva7.73

7.73
व्यापकत्वे शत्रुदेहं स्वं भ्रमन्तं विचिन्तयेत् । विद्रुतं करभारूढं विश्वमुचाटितं भवेत् ॥७३॥
vyāpakatve śatrudehaṃ svaṃ bhramantaṃ vicintayet | vidrutaṃ karabhārūḍhaṃ viśvamucāṭitaṃ bhavet
— व्यापकता (की अवस्था) में ; — शत्रु के शरीर को ; — अपना ; — भ्रमण करता हुआ ; — चिन्तन करे ; — विद्रुत (भागता हुआ) ; — करभ (ऊँट) पर आरूढ़ ; — समस्त (अस्तित्व) ; — उच्चाटित (निष्कासित) ; — हो जाएगा

व्यापकता (की अवस्था) में शत्रु के शरीर को अपना (मानकर) भ्रमण करता हुआ, विद्रुत (भागता हुआ), करभ (ऊँट) पर आरूढ़ चिन्तन करे; (तब उसका) समस्त (अस्तित्व) उच्चाटित (निष्कासित) हो जाएगा (— यह उच्चाटन-कर्म है)।