सर्वस्मिन् मयि कस्यापि कायं ध्यायन् जुगुप्सितम् ।
ममैवासौ च विद्वेष्यो विद्विष्टो जायते ततः ॥७२॥
sarvasmin mayi kasyāpi kāyaṃ dhyāyan jugupsitam |
mamaivāsau ca vidveṣyo vidviṣṭo jāyate tataḥ
जब मैं सब कुछ हूँ, (तब) किसी के शरीर का जुगुप्सित (घृणित) रूप में ध्यान करते हुए — वही मेरा (अंश) ही विद्वेष्य (तिरस्करणीय) हो जाता है, और तब (अन्यों के लिए) विद्विष्ट (द्वेष का पात्र) बन जाता है (— यह विद्वेषण-कर्म है)।