The Vision of Śiva· 7.71 / 122

The Vision of Śiva7.71

7.71
सर्वमस्मीति रुचिरं रूपमात्मनि चिन्तयन् । अहमेव मत्परो न भवेदाकर्षणक्रमः ॥७१॥
sarvamasmīti ruciraṃ rūpamātmani cintayan | ahameva matparo na bhavedākarṣaṇakramaḥ
— 'मैं सब हूँ' ; — इस प्रकार ; — रुचिर (मनोहर) रूप ; — अपने में ; — चिन्तन करता हुआ ; — 'मैं ही' ; — मुझमें परायण (मुझे ही परम मानने वाला) ; — क्या नहीं होगी? ; — आकर्षण-क्रम

'मैं सब कुछ हूँ' इस (भाव से) अपने में रुचिर (मनोहर) रूप का चिन्तन करता हुआ, 'मैं ही (समस्त हूँ)' — (ऐसे साधक के लिए) क्या आकर्षण-क्रम (समस्त वस्तुओं को अपनी ओर खींचने की प्रक्रिया) नहीं होगी?