सर्वमस्मीति रुचिरं रूपमात्मनि चिन्तयन् ।
अहमेव मत्परो न भवेदाकर्षणक्रमः ॥७१॥
sarvamasmīti ruciraṃ rūpamātmani cintayan |
ahameva matparo na bhavedākarṣaṇakramaḥ
'मैं सब कुछ हूँ' इस (भाव से) अपने में रुचिर (मनोहर) रूप का चिन्तन करता हुआ, 'मैं ही (समस्त हूँ)' — (ऐसे साधक के लिए) क्या आकर्षण-क्रम (समस्त वस्तुओं को अपनी ओर खींचने की प्रक्रिया) नहीं होगी?