सर्वव्याप्त्या स्नेहपूर्णं स्त्र्यादिकायात्मचिन्तनात् ।
जगद्विधेयतामेति किमुतैकशरीरकम् ॥७०॥
sarvavyāptyā snehapūrṇaṃ stryādikāyātmacintanāt |
jagadvidheyatāmeti kimutaikaśarīrakam
सर्व-व्याप्ति के द्वारा, स्नेह से पूर्ण स्त्री आदि के शरीर का अपने आत्मा के रूप में चिन्तन करने से (समस्त) जगत् विधेयता (वश) को प्राप्त हो जाता है; तो एक शरीर के विषय में तो कहना ही क्या!