The Vision of Śiva· 7.70 / 122

The Vision of Śiva7.70

7.70
सर्वव्याप्त्या स्नेहपूर्णं स्त्र्यादिकायात्मचिन्तनात् । जगद्विधेयतामेति किमुतैकशरीरकम् ॥७०॥
sarvavyāptyā snehapūrṇaṃ stryādikāyātmacintanāt | jagadvidheyatāmeti kimutaikaśarīrakam
— सर्व-व्याप्ति के द्वारा ; — स्नेह से पूर्ण ; — स्त्री आदि के शरीर का अपने आत्मरूप में चिन्तन करने से ; — जगत् ; — विधेयता (वश) को प्राप्त होता है ; — तो कहना ही क्या ; — एक शरीर के विषय में

सर्व-व्याप्ति के द्वारा, स्नेह से पूर्ण स्त्री आदि के शरीर का अपने आत्मा के रूप में चिन्तन करने से (समस्त) जगत् विधेयता (वश) को प्राप्त हो जाता है; तो एक शरीर के विषय में तो कहना ही क्या!