The Vision of Śiva· 7.65 / 122

The Vision of Śiva7.65

7.65
ईशे समग्रकर्तृत्वं सरस्वत्या मनूत्तमः । प्रमेये ममतावेशान्निर्मिणोति नवं जगत् ॥६५॥
īśe samagrakartṛtvaṃ sarasvatyā manūttamaḥ | prameye mamatāveśānnirmiṇoti navaṃ jagat
— ईश (तत्त्व) में ; — समग्र कर्तृत्व ; — सरस्वती (वाक्-शक्ति) के द्वारा ; — मनूत्तम (श्रेष्ठ साधक) ; — प्रमेय (ज्ञेय) में ; — 'यह मेरा' इस आवेश से ; — निर्माण करता है ; — नवीन जगत्

ईश (तत्त्व) में समग्र कर्तृत्व (रहता है); और सरस्वती (वाक्-शक्ति) के द्वारा मनूत्तम (श्रेष्ठ साधक) प्रमेय (ज्ञेय वस्तु) में 'यह मेरा है' इस ममता के आवेश से नवीन जगत् का निर्माण करता है।