कलने चिद्घनत्वं स्याद्वेदने सर्वचिद्गमः ।
स्नेहे तु सर्वकामत्वं कालात्सर्वर्तुवर्तनम् ॥६६॥
kalane cidghanatvaṃ syādvedane sarvacidgamaḥ |
snehe tu sarvakāmatvaṃ kālātsarvartuvartanam
कलन (बोधन-शक्ति) में चिद्घनत्व (चित् की सघनता) होगा; वेदन (अनुभूति) में सर्व-चित् की प्राप्ति; किन्तु स्नेह में सर्वकामत्व (समस्त कामनाओं की पूर्ति); (और) काल (पर अधिकार) से समस्त ऋतुओं का वर्तन (नियन्त्रण)।