The Vision of Śiva· 7.66 / 122

The Vision of Śiva7.66

7.66
कलने चिद्घनत्वं स्याद्वेदने सर्वचिद्गमः । स्नेहे तु सर्वकामत्वं कालात्सर्वर्तुवर्तनम् ॥६६॥
kalane cidghanatvaṃ syādvedane sarvacidgamaḥ | snehe tu sarvakāmatvaṃ kālātsarvartuvartanam
— कलन (बोधन) में ; — चिद्घनत्व (चित् की सघनता) ; — होगा ; — वेदन (अनुभूति) में ; — सर्व-चित् की प्राप्ति ; — किन्तु स्नेह में ; — सर्वकामत्व ; — काल (पर अधिकार) से ; — समस्त ऋतुओं का वर्तन (नियन्त्रण)

कलन (बोधन-शक्ति) में चिद्घनत्व (चित् की सघनता) होगा; वेदन (अनुभूति) में सर्व-चित् की प्राप्ति; किन्तु स्नेह में सर्वकामत्व (समस्त कामनाओं की पूर्ति); (और) काल (पर अधिकार) से समस्त ऋतुओं का वर्तन (नियन्त्रण)।