सकले च समासक्तस्तत्तद्रूपोपरूपणम् ।
सामर्थ्येऽखंडसामर्थ्यं सतते ज्ञानवीर्यता ॥६४॥
sakale ca samāsaktastattadrūpoparūpaṇam |
sāmarthye'khaṃḍasāmarthyaṃ satate jñānavīryatā
और सकल (अंशों के क्षेत्र) में समासक्त (पूर्णतः संलग्न) होकर उस-उस रूप का उपरूपण (आकल्पन होता है); सामर्थ्य (के क्षेत्र) में अखण्ड सामर्थ्य; (और) सतत (नित्य आधार) में ज्ञान-वीर्यता (ज्ञान की शक्ति)।