The Vision of Śiva· 7.64 / 122

The Vision of Śiva7.64

7.64
सकले च समासक्तस्तत्तद्रूपोपरूपणम् । सामर्थ्येऽखंडसामर्थ्यं सतते ज्ञानवीर्यता ॥६४॥
sakale ca samāsaktastattadrūpoparūpaṇam | sāmarthye'khaṃḍasāmarthyaṃ satate jñānavīryatā
— और सकल (अंशों के क्षेत्र) में ; — समासक्त (पूर्णतः संलग्न) ; — उस-उस रूप का उपरूपण ; — सामर्थ्य में ; — अखण्ड सामर्थ्य ; — सतत (नित्य) में ; — ज्ञान-वीर्यता

और सकल (अंशों के क्षेत्र) में समासक्त (पूर्णतः संलग्न) होकर उस-उस रूप का उपरूपण (आकल्पन होता है); सामर्थ्य (के क्षेत्र) में अखण्ड सामर्थ्य; (और) सतत (नित्य आधार) में ज्ञान-वीर्यता (ज्ञान की शक्ति)।