The Vision of Śiva· 7.58 / 122

The Vision of Śiva7.58

7.58
प्रसरत्यस्ति विज्ञानं सर्वदिक्कमबाधितम् । ममत्वमानसे साधु साधूनां सक्तिमागते ॥५८॥
prasaratyasti vijñānaṃ sarvadikkamabādhitam | mamatvamānase sādhu sādhūnāṃ saktimāgate
— प्रसृत होता है ; — विद्यमान रहता है ; — विज्ञान (ज्ञान) ; — सर्वदिक्क ; — अबाधित ; — ममत्व से युक्त मानस में ; — भलीभाँति ; — साधुओं का ; — सक्ति (आसक्ति) को प्राप्त होने पर

सर्वदिक्क (सब दिशाओं में फैलता हुआ) अबाधित विज्ञान (ज्ञान) प्रसृत होकर विद्यमान रहता है, जब साधुओं (सत्पुरुषों) का ममत्व से युक्त मानस भलीभाँति (इस सर्वव्यापी) सक्ति (आसक्ति) को प्राप्त हो जाता है।