सम्यगुत्पद्यतेऽन्तर्धिरूपणं भक्तिनिर्गतिः ।
मतिर्ममत्वनिर्माणमनसां महतां तराम् ॥५७॥
samyagutpadyate'ntardhirūpaṇaṃ bhaktinirgatiḥ |
matirmamatvanirmāṇamanasāṃ mahatāṃ tarām
सम्यक् रूप से अन्तर्धि-रूपण (आन्तरिक दर्शन/मूर्तिकल्पन), भक्ति का निर्गमन (उच्छलन), तथा मति (प्रज्ञा) उत्पन्न होती है — विशेषतः उन महान् (आत्माओं) में, जिनके मन 'सब मेरा ही है' (इस) ममत्व का निर्माण करते हैं।