The Vision of Śiva· 7.57 / 122

The Vision of Śiva7.57

7.57
सम्यगुत्पद्यतेऽन्तर्धिरूपणं भक्तिनिर्गतिः । मतिर्ममत्वनिर्माणमनसां महतां तराम् ॥५७॥
samyagutpadyate'ntardhirūpaṇaṃ bhaktinirgatiḥ | matirmamatvanirmāṇamanasāṃ mahatāṃ tarām
— सम्यक् ; — उत्पन्न होती है ; — अन्तर्धि-रूपण (आन्तरिक दर्शन) ; — भक्ति का निर्गमन ; — मति (प्रज्ञा) ; — 'सब मेरा' इस ममत्व का निर्माण करने वाले मन वालों में ; — महान् (आत्माओं) में ; — अत्यधिक

सम्यक् रूप से अन्तर्धि-रूपण (आन्तरिक दर्शन/मूर्तिकल्पन), भक्ति का निर्गमन (उच्छलन), तथा मति (प्रज्ञा) उत्पन्न होती है — विशेषतः उन महान् (आत्माओं) में, जिनके मन 'सब मेरा ही है' (इस) ममत्व का निर्माण करते हैं।