The Vision of Śiva· 7.55 / 122

The Vision of Śiva7.55

7.55
सर्वस्य श्रेयसो नूनं सत्यान्निर्गतता मता । मूले समर्थतावेशो मध्ये तुल्यत्वमेतयोः ॥५५॥
sarvasya śreyaso nūnaṃ satyānnirgatatā matā | mūle samarthatāveśo madhye tulyatvametayoḥ
— समस्त श्रेय की ; — निश्चय ही ; — सत् से ; — निर्गतता (उद्भव) ; — मानी गई ; — मूल में ; — समर्थता का आवेश ; — मध्य में ; — तुल्यता ; — इन दोनों की

समस्त श्रेय (कल्याण) की निर्गतता (उद्भव) निश्चय ही सत् (परम सत्ता) से (होती) मानी गई है; मूल में समर्थता (पूर्ण सामर्थ्य) का आवेश (प्रवेश रहता है), और मध्य (अवस्था) में इन दोनों (सामर्थ्य और उसके फल) की तुल्यता।