सर्वस्य श्रेयसो नूनं सत्यान्निर्गतता मता ।
मूले समर्थतावेशो मध्ये तुल्यत्वमेतयोः ॥५५॥
sarvasya śreyaso nūnaṃ satyānnirgatatā matā |
mūle samarthatāveśo madhye tulyatvametayoḥ
समस्त श्रेय (कल्याण) की निर्गतता (उद्भव) निश्चय ही सत् (परम सत्ता) से (होती) मानी गई है; मूल में समर्थता (पूर्ण सामर्थ्य) का आवेश (प्रवेश रहता है), और मध्य (अवस्था) में इन दोनों (सामर्थ्य और उसके फल) की तुल्यता।