सर्वाकारे महाकाररचना रुचिराचिरात् ।
सर्वत्रैक्ये स्थिरा रूढिर्जन्या रागादिनाहता ॥५४॥
sarvākāre mahākāraracanā rucirācirāt |
sarvatraikye sthirā rūḍhirjanyā rāgādināhatā
सर्वाकार (सर्व-रूप संवित्) में अचिर (शीघ्र) ही महान् आकार की रुचिर (मनोहर) रचना (होती) है; (इस) सर्वत्र-ऐक्य में स्थिर रूढ़ि (दृढ़ अवस्थिति) जन्य (उत्पाद्य) है, जो राग आदि से अनाहत (अनाक्रान्त) रहती है।