The Vision of Śiva· 7.54 / 122

The Vision of Śiva7.54

7.54
सर्वाकारे महाकाररचना रुचिराचिरात् । सर्वत्रैक्ये स्थिरा रूढिर्जन्या रागादिनाहता ॥५४॥
sarvākāre mahākāraracanā rucirācirāt | sarvatraikye sthirā rūḍhirjanyā rāgādināhatā
— सर्वाकार (संवित्) में ; — महान् आकार की रचना ; — रुचिर (मनोहर) ; — अचिर (शीघ्र) ही ; — सर्वत्र-ऐक्य में ; — स्थिर रूढ़ि ; — जन्य (उत्पाद्य) ; — राग आदि से अनाहत

सर्वाकार (सर्व-रूप संवित्) में अचिर (शीघ्र) ही महान् आकार की रुचिर (मनोहर) रचना (होती) है; (इस) सर्वत्र-ऐक्य में स्थिर रूढ़ि (दृढ़ अवस्थिति) जन्य (उत्पाद्य) है, जो राग आदि से अनाहत (अनाक्रान्त) रहती है।