The Vision of Śiva· 7.53 / 122

The Vision of Śiva7.53

7.53
सर्वत्रानुभवावस्थाप्रसरः सारतो भवेत् । सर्वस्यैव स्थिरं रूपं सर्वाकारतदात्मना ॥५३॥
sarvatrānubhavāvasthāprasaraḥ sārato bhavet | sarvasyaiva sthiraṃ rūpaṃ sarvākāratadātmanā
— सर्वत्र ; — अनुभव-अवस्था का प्रसार ; — सारत: (तत्त्वत:) ; — हो जाए ; — सबका ही ; — स्थिर रूप ; — समस्त आकारों के आत्मा रूप उस (संवित्) के द्वारा

सर्वत्र अनुभव-अवस्था का प्रसार सारत: (तत्त्वत:) हो जाए; सबका ही स्थिर रूप है, उस (संवित्) के समस्त आकारों के आत्मा होने से।