सर्वत्रानुभवावस्थाप्रसरः सारतो भवेत् ।
सर्वस्यैव स्थिरं रूपं सर्वाकारतदात्मना ॥५३॥
sarvatrānubhavāvasthāprasaraḥ sārato bhavet |
sarvasyaiva sthiraṃ rūpaṃ sarvākāratadātmanā
सर्वत्र अनुभव-अवस्था का प्रसार सारत: (तत्त्वत:) हो जाए; सबका ही स्थिर रूप है, उस (संवित्) के समस्त आकारों के आत्मा होने से।