The Vision of Śiva· 7.52 / 122

The Vision of Śiva7.52

7.52
यस्मात्पदार्थता तुल्या चित्ताभावोद्भवो मुहुः । सर्वत्र चित्ताभावेन सत्याकारतया स्थितेः ॥५२॥
yasmātpadārthatā tulyā cittābhāvodbhavo muhuḥ | sarvatra cittābhāvena satyākāratayā sthiteḥ
— क्योंकि ; — पदार्थता ; — तुल्य (समान) ; — चित्त-भाव (चित् में स्थिति) का उद्भव ; — पुन:-पुन: ; — सर्वत्र ; — चित्त-भाव (चित् में सत्ता) के द्वारा ; — सत्य आकार वाली होने से ; — अवस्थिति के कारण

क्योंकि पदार्थता (सबमें) तुल्य (समान) है, उसके चित्त-भाव (चित् में स्थिति) का उद्भव सर्वत्र पुन:-पुन: (होता रहता है), चित्त-भाव (चित् में सत्ता) के द्वारा — क्योंकि (प्रत्येक वस्तु) सत्य आकार (वाली होकर एक संवित् में) अवस्थित रहती है।