तद्वदन्यत्र भावादौ स्वात्मशक्त्या किलाधिपः ।
सर्वभावेषु सद्योगात्सत्यत्वे शिवता स्थिता ॥५०॥
tadvadanyatra bhāvādau svātmaśaktyā kilādhipaḥ |
sarvabhāveṣu sadyogātsatyatve śivatā sthitā
उसी प्रकार, अन्यत्र भी — भाव (वस्तु) आदि में — (साधक) निश्चय ही अपने आत्मा की शक्ति से अधिप (स्वामी) (होता है); और समस्त भावों में, सत् (परम सत्ता) के योग के कारण, उनके सत्यत्व (वास्तविकता) में ही शिवता अवस्थित रहती है।