The Vision of Śiva· 7.50 / 122

The Vision of Śiva7.50

7.50
तद्वदन्यत्र भावादौ स्वात्मशक्त्या किलाधिपः । सर्वभावेषु सद्योगात्सत्यत्वे शिवता स्थिता ॥५०॥
tadvadanyatra bhāvādau svātmaśaktyā kilādhipaḥ | sarvabhāveṣu sadyogātsatyatve śivatā sthitā
— उसी प्रकार ; — अन्यत्र ; — भाव (वस्तु) आदि में ; — अपने आत्मा की शक्ति से ; — निश्चय ही ; — अधिप (स्वामी) ; — समस्त भावों में ; — सत् के योग से ; — सत्यत्व में ; — शिवता ; — अवस्थित

उसी प्रकार, अन्यत्र भी — भाव (वस्तु) आदि में — (साधक) निश्चय ही अपने आत्मा की शक्ति से अधिप (स्वामी) (होता है); और समस्त भावों में, सत् (परम सत्ता) के योग के कारण, उनके सत्यत्व (वास्तविकता) में ही शिवता अवस्थित रहती है।