सकृज्ज्ञाते सुवर्णे हि भावना करणं व्रजेत् ।
एकवारं प्रमाणेन शास्त्राद्वा गुरुवाक्यतः ॥५॥
sakṛjjñāte suvarṇe hi bhāvanā karaṇaṃ vrajet |
ekavāraṃ pramāṇena śāstrādvā guruvākyataḥ
सुवर्ण के एक बार ज्ञात हो जाने पर — (चाहे) एक बार प्रमाण के द्वारा, अथवा शास्त्र से, अथवा गुरु के वाक्य से — क्या (आगे की) भावना (अभ्यास) करण (साधक उपाय) बनेगी (— इसी प्रकार शिवत्व के विषय में भी)?