The Vision of Śiva· 7.6 / 122

The Vision of Śiva7.6

7.6
ज्ञाते शिवत्वे सर्वस्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना । करणेन नास्ति कृत्यं क्वापि भावनयापिवा ॥६॥
jñāte śivatve sarvasthe pratipattyā dṛḍhātmanā | karaṇena nāsti kṛtyaṃ kvāpi bhāvanayāpivā
— ज्ञात होने पर ; — शिवत्व ; — सबमें स्थित ; — प्रतिपत्ति (निश्चय) के द्वारा ; — दृढ़स्वरूप ; — करण (उपाय) से ; — कोई कृत्य नहीं ; — कहीं भी ; — अथवा भावना से भी

सर्वस्थ (सबमें स्थित) शिवत्व के दृढ़ प्रतिपत्ति (निश्चय) के द्वारा ज्ञात हो जाने पर, करण (उपाय) से कहीं भी कोई कृत्य (प्रयोजन) नहीं रहता, और न ही भावना (अभ्यास) से (— प्रत्यभिज्ञा मात्र ही मुक्त करती है)।