ज्ञाते शिवत्वे सर्वस्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना ।
करणेन नास्ति कृत्यं क्वापि भावनयापिवा ॥६॥
jñāte śivatve sarvasthe pratipattyā dṛḍhātmanā |
karaṇena nāsti kṛtyaṃ kvāpi bhāvanayāpivā
सर्वस्थ (सबमें स्थित) शिवत्व के दृढ़ प्रतिपत्ति (निश्चय) के द्वारा ज्ञात हो जाने पर, करण (उपाय) से कहीं भी कोई कृत्य (प्रयोजन) नहीं रहता, और न ही भावना (अभ्यास) से (— प्रत्यभिज्ञा मात्र ही मुक्त करती है)।