चिन्तामणिरविज्ञातो भवेच्चिन्तामणिः स्फुटम् ।
तथापि कार्यभोगार्थं स ज्ञातः केन वार्यते ॥४॥
cintāmaṇiravijñāto bhaveccintāmaṇiḥ sphuṭam |
tathāpi kāryabhogārthaṃ sa jñātaḥ kena vāryate
अविज्ञात चिन्तामणि भी स्पष्टतः (फिर भी) चिन्तामणि ही होगा; तथापि उसके कार्य तथा भोग की प्राप्ति के लिए उसका ज्ञात होना किसके द्वारा निवारित किया जाए (— ज्ञान ही उसका फल उद्घाटित करता है)?