The Vision of Śiva· 7.4 / 122

The Vision of Śiva7.4

7.4
चिन्तामणिरविज्ञातो भवेच्चिन्तामणिः स्फुटम् । तथापि कार्यभोगार्थं स ज्ञातः केन वार्यते ॥४॥
cintāmaṇiravijñāto bhaveccintāmaṇiḥ sphuṭam | tathāpi kāryabhogārthaṃ sa jñātaḥ kena vāryate
— चिन्तामणि ; — अविज्ञात ; — होगा ; — चिन्तामणि ; — स्पष्टतः ; — तथापि ; — कार्य तथा भोग के लिए ; — उसका ज्ञात होना ; — किसके द्वारा निवारित किया जाता है?

अविज्ञात चिन्तामणि भी स्पष्टतः (फिर भी) चिन्तामणि ही होगा; तथापि उसके कार्य तथा भोग की प्राप्ति के लिए उसका ज्ञात होना किसके द्वारा निवारित किया जाए (— ज्ञान ही उसका फल उद्घाटित करता है)?