The Vision of Śiva· 7.3 / 122

The Vision of Śiva7.3

7.3
सत्यमेवं तथापीह सुवर्णं ज्ञातमात्रकम् । मूल्यादिनोपभोगाय दानार्थमुपयुज्यते ॥३॥
satyamevaṃ tathāpīha suvarṇaṃ jñātamātrakam | mūlyādinopabhogāya dānārthamupayujyate
— सत्य ; — ऐसा ही ; — तथापि ; — यहाँ ; — सुवर्ण ; — मात्र ज्ञात होने पर ; — मूल्य आदि के द्वारा ; — उपभोग के लिए ; — दान के लिए ; — उपयुक्त होता है

सत्य है, ऐसा ही है; तथापि यहाँ सुवर्ण मात्र ज्ञात हो जाने पर ही — अपने मूल्य आदि के द्वारा — उपभोग के लिए तथा दान के लिए उपयुक्त (सेवायोग्य) हो जाता है (अतः ज्ञान का व्यावहारिक फल है)।