काष्ठकुड्यादिषु क्षिप्ते रसवच्छिवहेमता ।
तत्तत्तत्त्वबलावेशात् सर्ववस्त्वेकरूपिणम् ॥४८॥
kāṣṭhakuḍyādiṣu kṣipte rasavacchivahematā |
tattattattvabalāveśāt sarvavastvekarūpiṇam
जैसे रस (पारद) काष्ठ, भित्ति (दीवार) आदि पर डाले जाने पर (उन्हें स्वर्ण बना देता है), वैसे ही (यह भावना) शिवरूप हेमता (स्वर्णत्व) (सिद्ध करती है); उस-उस तत्त्व के बल के आवेश (बलपूर्वक प्रवेश) से, (साधक) समस्त वस्तु को एकरूप (कर लेता है)।