The Vision of Śiva· 7.47 / 122

The Vision of Śiva7.47

7.47
विश्वमेकस्वरूपेण रूपेण प्रतिपद्यते । शिवभावनयौषध्या बद्धे मनसि संसृतेः ॥४७॥
viśvamekasvarūpeṇa rūpeṇa pratipadyate | śivabhāvanayauṣadhyā baddhe manasi saṃsṛteḥ
— विश्व को ; — एक ही स्वरूप के रूप में ; — प्रतिपन्न (अनुभव) करता है ; — शिव की भावना के द्वारा ; — औषधि के समान ; — मन के बद्ध (स्थिर) हो जाने पर ; — संसृति से

(साधक) विश्व को एक ही स्वरूप के रूप में प्रतिपन्न (अनुभव) करता है; (और) औषधि के समान शिव की भावना के द्वारा, मन के (इस प्रकार) बद्ध (स्थिर) हो जाने पर, संसृति (संसार-प्रवाह) से (मुक्त हो जाता है — अग्रिम कारिका रसायन-दृष्टान्त देती है)।