प्रापितो जगदैक्यं च समन्तादवकल्पते ।
यत्र तत्रापि विश्रान्तिलीनं शक्तिचतुष्टये ॥४६॥
prāpito jagadaikyaṃ ca samantādavakalpate |
yatra tatrāpi viśrāntilīnaṃ śakticatuṣṭaye
और (इस प्रकार) प्रापित (एकता को पहुँचा हुआ साधक) जगत् की एकता को सर्वत्र (अवकल्पित) घटित कर लेता है; जहाँ-कहीं भी (वह देखता है, जगत्) शक्ति-चतुष्टय (इच्छा, ज्ञान, क्रिया तथा उनके आधार) में विश्रान्तिलीन (विश्राम में विलीन) (प्रतीत होता है)।