The Vision of Śiva· 7.46 / 122

The Vision of Śiva7.46

7.46
प्रापितो जगदैक्यं च समन्तादवकल्पते । यत्र तत्रापि विश्रान्तिलीनं शक्तिचतुष्टये ॥४६॥
prāpito jagadaikyaṃ ca samantādavakalpate | yatra tatrāpi viśrāntilīnaṃ śakticatuṣṭaye
— प्रापित (एकता को पहुँचा हुआ) ; — और जगत् की एकता ; — सर्वत्र ; — अवकल्पित (घटित) होती है ; — जहाँ-कहीं भी ; — विश्रान्ति में लीन ; — शक्ति-चतुष्टय में

और (इस प्रकार) प्रापित (एकता को पहुँचा हुआ साधक) जगत् की एकता को सर्वत्र (अवकल्पित) घटित कर लेता है; जहाँ-कहीं भी (वह देखता है, जगत्) शक्ति-चतुष्टय (इच्छा, ज्ञान, क्रिया तथा उनके आधार) में विश्रान्तिलीन (विश्राम में विलीन) (प्रतीत होता है)।