The Vision of Śiva· 7.45 / 122

The Vision of Śiva7.45

7.45
आत्मनो महिमा ज्ञेयस्ततः सृष्टेरनन्तता । स्थूलभावादविभ्रान्तदृष्टिपातात्तदेकताम् ॥४५॥
ātmano mahimā jñeyastataḥ sṛṣṭeranantatā | sthūlabhāvādavibhrāntadṛṣṭipātāttadekatām
— आत्मा का ; — महिमा ; — ज्ञातव्य ; — उससे ; — सृष्टि की अनन्तता ; — स्थूल भाव (वस्तु) से ; — अविभ्रान्त दृष्टिपात से ; — उसके साथ एकता को

आत्मा का महिमा ज्ञातव्य है, और उससे सृष्टि की अनन्तता; स्थूल भाव (वस्तु) से, अविभ्रान्त (अविचल) दृष्टिपात के द्वारा, (साधक) उसके साथ एकता को (प्राप्त होता है)।