आत्मनो महिमा ज्ञेयस्ततः सृष्टेरनन्तता ।
स्थूलभावादविभ्रान्तदृष्टिपातात्तदेकताम् ॥४५॥
ātmano mahimā jñeyastataḥ sṛṣṭeranantatā |
sthūlabhāvādavibhrāntadṛṣṭipātāttadekatām
आत्मा का महिमा ज्ञातव्य है, और उससे सृष्टि की अनन्तता; स्थूल भाव (वस्तु) से, अविभ्रान्त (अविचल) दृष्टिपात के द्वारा, (साधक) उसके साथ एकता को (प्राप्त होता है)।