The Vision of Śiva· 7.44 / 122

The Vision of Śiva7.44

7.44
तथा सकलरूपाणां भावनैव तथा स्वयम् । निजान्तः सृष्टिबाह्यस्थस्थूलसन्निधियोगतः ॥४४॥
tathā sakalarūpāṇāṃ bhāvanaiva tathā svayam | nijāntaḥ sṛṣṭibāhyasthasthūlasannidhiyogataḥ
— उसी प्रकार ; — समस्त रूपों की ; — भावना (सर्जक भाव-कल्पना) ही ; — उसी प्रकार ; — स्वयं ; — अपने आन्तरिक सृष्टि के बाह्य-स्थित स्थूल के सन्निधि-योग से

उसी प्रकार समस्त रूपों की (सिद्धि) भावना (सर्जक भाव-कल्पना) ही है — (वह भी) स्वयं ही, अपने आन्तरिक सृष्टि के बाह्य-स्थित स्थूल (वस्तु) के सन्निधि (समीपता) के साथ योग से।