तथा सकलरूपाणां भावनैव तथा स्वयम् ।
निजान्तः सृष्टिबाह्यस्थस्थूलसन्निधियोगतः ॥४४॥
tathā sakalarūpāṇāṃ bhāvanaiva tathā svayam |
nijāntaḥ sṛṣṭibāhyasthasthūlasannidhiyogataḥ
उसी प्रकार समस्त रूपों की (सिद्धि) भावना (सर्जक भाव-कल्पना) ही है — (वह भी) स्वयं ही, अपने आन्तरिक सृष्टि के बाह्य-स्थित स्थूल (वस्तु) के सन्निधि (समीपता) के साथ योग से।