संस्पर्शतस्तदुद्बोध अन्यत्रापि तथा स्थितिः ।
स्वदेहे देवदृढता नागादिदमनार्हता ॥४३॥
saṃsparśatastadudbodha anyatrāpi tathā sthitiḥ |
svadehe devadṛḍhatā nāgādidamanārhatā
(मात्र) संस्पर्श से उस (शक्ति) का उद्बोध (जागरण), तथा अन्यत्र भी उसी प्रकार स्थिति (होती है); (और प्रकट होते हैं) अपने देह में दृढ़ देवता-भाव, (तथा) नाग आदि के दमन की अर्हता (सामर्थ्य)।