The Vision of Śiva· 7.43 / 122

The Vision of Śiva7.43

7.43
संस्पर्शतस्तदुद्बोध अन्यत्रापि तथा स्थितिः । स्वदेहे देवदृढता नागादिदमनार्हता ॥४३॥
saṃsparśatastadudbodha anyatrāpi tathā sthitiḥ | svadehe devadṛḍhatā nāgādidamanārhatā
— संस्पर्श से ; — उस (शक्ति) का उद्बोध ; — अन्यत्र भी ; — उसी प्रकार स्थिति ; — अपने देह में ; — दृढ़ देवता-भाव ; — नाग आदि के दमन की अर्हता

(मात्र) संस्पर्श से उस (शक्ति) का उद्बोध (जागरण), तथा अन्यत्र भी उसी प्रकार स्थिति (होती है); (और प्रकट होते हैं) अपने देह में दृढ़ देवता-भाव, (तथा) नाग आदि के दमन की अर्हता (सामर्थ्य)।