देहान्तरेषु संक्रान्तिः परित्यागोऽपरेष्वपि ।
अन्तर्मुखमुखाक्ष्यादिक्रमगोचरचिद्गतेः ॥४२॥
dehāntareṣu saṃkrāntiḥ parityāgo'pareṣvapi |
antarmukhamukhākṣyādikramagocaracidgateḥ
(प्रकट होते हैं) अन्य देहों में संक्रान्ति (प्रवेश), (अपने देह का) परित्याग, तथा अन्यों में भी (प्रवेश) — अन्तर्मुख मुख, नेत्र आदि के क्रम से (विचरण करते हुए) चित् की गति के गोचर (विषय) होने के कारण।