देवताहेमनिर्माणसन्निधानस्फुटार्थताः ।
साम्मुख्यवृत्तिदेहान्तरतिरागमहागुणाः ॥४१॥
devatāhemanirmāṇasannidhānasphuṭārthatāḥ |
sāmmukhyavṛttidehāntaratirāgamahāguṇāḥ
(इनसे प्रकट होते हैं) देवता तथा स्वर्ण का निर्माण, (वस्तुओं का) सन्निधान (समीप लाना), अर्थों (पदार्थों) की स्फुटता (विशदता); (तथा) महागुण (विशिष्ट सिद्धियाँ) — साम्मुख्य (इष्ट की प्रत्यक्ष उपस्थिति), अन्य देह में वृत्ति (प्रवेश), तथा तीव्र अनुराग (आकर्षण-शक्ति)।