तत्तद्भावभरासक्तेस्तत्तन्निर्माणमानता ।
लसदग्रस्फुरत्तेजः कणसत्तोद्भवो महान् ॥४०॥
tattadbhāvabharāsaktestattannirmāṇamānatā |
lasadagrasphurattejaḥ kaṇasattodbhavo mahān
उस-उस भाव (अस्तित्व-रूप) के भार में आसक्ति (तल्लीनता) से उस-उस का निर्माण करने की मानता (सामर्थ्य उत्पन्न होती है); (और) अपने अग्र (शिखर) पर लसमान (देदीप्यमान) स्फुरित तेज (वाले चित्-)कण की सत्ता का महान् उद्भव (होता है)।