The Vision of Śiva· 7.40 / 122

The Vision of Śiva7.40

7.40
तत्तद्भावभरासक्तेस्तत्तन्निर्माणमानता । लसदग्रस्फुरत्तेजः कणसत्तोद्भवो महान् ॥४०॥
tattadbhāvabharāsaktestattannirmāṇamānatā | lasadagrasphurattejaḥ kaṇasattodbhavo mahān
— उस-उस भाव के भार में आसक्ति से ; — उस-उस के निर्माण की मानता (सामर्थ्य) ; — अग्र पर देदीप्यमान स्फुरित तेज (वाले) ; — (चित्-)कण की सत्ता का उद्भव ; — महान्

उस-उस भाव (अस्तित्व-रूप) के भार में आसक्ति (तल्लीनता) से उस-उस का निर्माण करने की मानता (सामर्थ्य उत्पन्न होती है); (और) अपने अग्र (शिखर) पर लसमान (देदीप्यमान) स्फुरित तेज (वाले चित्-)कण की सत्ता का महान् उद्भव (होता है)।