The Vision of Śiva· 7.37 / 122

The Vision of Śiva7.37

7.37
दुःखासक्त्यान्यथासक्त्या सुखे निर्वृतिभूमिता । जडकायांगनिचये मद्दार्ढ्योचितचिन्तया ॥३७॥
duḥkhāsaktyānyathāsaktyā sukhe nirvṛtibhūmitā | jaḍakāyāṃganicaye maddārḍhyocitacintayā
— दु:ख में अनासक्ति के द्वारा ; — आसक्ति को अन्यथा मोड़ने के द्वारा ; — सुख में ; — निर्वृति-भूमि की प्राप्ति ; — जड़ काय के अंग-समूह में ; — 'मैं ही दृढ़ (तत्त्व) हूँ' इस उचित चिन्तन के द्वारा

दु:ख में अनासक्ति के द्वारा, तथा आसक्ति को अन्यथा (आत्मा की ओर) मोड़ने के द्वारा, (साधक) सुख में निर्वृति-भूमि (आनन्द की भूमिका) को प्राप्त होता है; (और) जड़ काय (शरीर) के अंग-समूह में 'मैं ही दृढ़ (तत्त्व) हूँ' इस उचित चिन्तन के द्वारा (चित् उसमें भी व्याप्त होती है)।