दुःखासक्त्यान्यथासक्त्या सुखे निर्वृतिभूमिता ।
जडकायांगनिचये मद्दार्ढ्योचितचिन्तया ॥३७॥
duḥkhāsaktyānyathāsaktyā sukhe nirvṛtibhūmitā |
jaḍakāyāṃganicaye maddārḍhyocitacintayā
दु:ख में अनासक्ति के द्वारा, तथा आसक्ति को अन्यथा (आत्मा की ओर) मोड़ने के द्वारा, (साधक) सुख में निर्वृति-भूमि (आनन्द की भूमिका) को प्राप्त होता है; (और) जड़ काय (शरीर) के अंग-समूह में 'मैं ही दृढ़ (तत्त्व) हूँ' इस उचित चिन्तन के द्वारा (चित् उसमें भी व्याप्त होती है)।