जडाशेषपदार्थात्मरूढेस्तद्बोधपूर्णता ।
निजाभिमानसंसृष्टे स्वशरीरे महोदयात् ॥३८॥
jaḍāśeṣapadārthātmarūḍhestadbodhapūrṇatā |
nijābhimānasaṃsṛṣṭe svaśarīre mahodayāt
समस्त जड़ पदार्थों के आत्मा के रूप में (दृढ़) रूढ़ि (अवस्थिति) से उस बोध की पूर्णता (प्राप्त होती है); (और यह) अपने ही अभिमान से संसृष्ट (मिश्रित) अपने शरीर में, (चित् के) महान् उदय से (सिद्ध होती है)।