The Vision of Śiva· 7.38 / 122

The Vision of Śiva7.38

7.38
जडाशेषपदार्थात्मरूढेस्तद्बोधपूर्णता । निजाभिमानसंसृष्टे स्वशरीरे महोदयात् ॥३८॥
jaḍāśeṣapadārthātmarūḍhestadbodhapūrṇatā | nijābhimānasaṃsṛṣṭe svaśarīre mahodayāt
— समस्त जड़ पदार्थों के आत्मरूप में (दृढ़) रूढ़ि से ; — उस बोध की पूर्णता ; — अपने अभिमान से संसृष्ट ; — अपने शरीर में ; — महान् उदय से

समस्त जड़ पदार्थों के आत्मा के रूप में (दृढ़) रूढ़ि (अवस्थिति) से उस बोध की पूर्णता (प्राप्त होती है); (और यह) अपने ही अभिमान से संसृष्ट (मिश्रित) अपने शरीर में, (चित् के) महान् उदय से (सिद्ध होती है)।