The Vision of Śiva· 7.36 / 122

The Vision of Śiva7.36

7.36
संविद्देहतद्गतत्वे संवित्स्वातन्त्र्यमापतेत् । तोषे निर्वृतियोगो वा दार्ढ्यात् स्वातन्त्र्यमेतयोः ॥३६॥
saṃviddehatadgatatve saṃvitsvātantryamāpatet | toṣe nirvṛtiyogo vā dārḍhyāt svātantryametayoḥ
— संवित् के देह तथा देहगत में व्याप्त होने पर ; — संवित् का स्वातन्त्र्य ; — आ पड़ता है ; — तोष (सन्तोष) में ; — निर्वृति (आनन्द) का योग ; — अथवा ; — दृढ़ता के कारण ; — स्वातन्त्र्य ; — इन दोनों का

संवित् (अनुभूति) के देह तथा देहगत (विषयों) में (व्याप्त) हो जाने पर, संवित् का स्वातन्त्र्य आ पड़ता (प्राप्त होता) है; अथवा (गहन) तोष (सन्तोष) में निर्वृति (आनन्द) का योग; और दृढ़ता के कारण इन दोनों (ज्ञान और क्रिया) का स्वातन्त्र्य (प्राप्त होता है)।