संविद्देहतद्गतत्वे संवित्स्वातन्त्र्यमापतेत् ।
तोषे निर्वृतियोगो वा दार्ढ्यात् स्वातन्त्र्यमेतयोः ॥३६॥
saṃviddehatadgatatve saṃvitsvātantryamāpatet |
toṣe nirvṛtiyogo vā dārḍhyāt svātantryametayoḥ
संवित् (अनुभूति) के देह तथा देहगत (विषयों) में (व्याप्त) हो जाने पर, संवित् का स्वातन्त्र्य आ पड़ता (प्राप्त होता) है; अथवा (गहन) तोष (सन्तोष) में निर्वृति (आनन्द) का योग; और दृढ़ता के कारण इन दोनों (ज्ञान और क्रिया) का स्वातन्त्र्य (प्राप्त होता है)।