The Vision of Śiva· 7.35 / 122

The Vision of Śiva7.35

7.35
ज्ञानयोगसमुद्युक्तिलीनत्वेन क्रियागमः । इच्छातः कान्तितेजोभिस्तत्कर्तृत्वमहेशता ॥३५॥
jñānayogasamudyuktilīnatvena kriyāgamaḥ | icchātaḥ kāntitejobhistatkartṛtvamaheśatā
— ज्ञान और योग की समुद्युक्ति में लीनता के द्वारा ; — क्रिया का आगम ; — इच्छा से ; — कान्ति-तेज के साथ ; — वह कर्तृत्व ; — महेशता (परम स्वामित्व)

ज्ञान और योग की समुद्युक्ति (पूर्ण संयोग) में लीनता के द्वारा क्रिया का आगम (उदय होता है); इच्छा से, (उसकी) कान्ति-तेज (दीप्ति की प्रभाओं) के साथ, वह कर्तृत्व — महेशता (परम स्वामित्व) (प्रकट होता है)।