The Vision of Śiva· 7.34 / 122

The Vision of Śiva7.34

7.34
प्रतीत्युद्गमकाले तु सार्वभाव्यादसौ विभुः । सृष्टानुभवदो रूढेरमूर्तज्ञानचिल्लयात् ॥३४॥
pratītyudgamakāle tu sārvabhāvyādasau vibhuḥ | sṛṣṭānubhavado rūḍheramūrtajñānacillayāt
— प्रतीति के उद्गम के काल में ; — किन्तु ; — सर्व-भावत्व के कारण ; — यह (चित्) ; — विभु (व्यापक) ; — सृष्ट का अनुभव प्रदान करने वाला ; — (दृढ़) रूढ़ि से ; — अमूर्त ज्ञानरूप चित् में लय के कारण

किन्तु प्रतीति (अनुभूति) के उद्गम के काल में, (अपने) सर्व-भावत्व के कारण यह विभु (व्यापक चित्) सृष्ट (रचित) का अनुभव प्रदान करता है — (दृढ़) रूढ़ि (अवस्थिति) से, अमूर्त ज्ञानरूप चित् में लय के कारण।