प्रतीत्युद्गमकाले तु सार्वभाव्यादसौ विभुः ।
सृष्टानुभवदो रूढेरमूर्तज्ञानचिल्लयात् ॥३४॥
pratītyudgamakāle tu sārvabhāvyādasau vibhuḥ |
sṛṣṭānubhavado rūḍheramūrtajñānacillayāt
किन्तु प्रतीति (अनुभूति) के उद्गम के काल में, (अपने) सर्व-भावत्व के कारण यह विभु (व्यापक चित्) सृष्ट (रचित) का अनुभव प्रदान करता है — (दृढ़) रूढ़ि (अवस्थिति) से, अमूर्त ज्ञानरूप चित् में लय के कारण।