पुरोऽणुपुञ्जभ्रान्त्याप्त्या चित्त्वलाभो जडेष्वपि ।
सर्वचित्क्षेपतः साम्यात्सर्वत्रेच्छात्र ईदृशी ॥३३॥
puro'ṇupuñjabhrāntyāptyā cittvalābho jaḍeṣvapi |
sarvacitkṣepataḥ sāmyātsarvatrecchātra īdṛśī
सामने (घूमते हुए) अणु-पुंज की भ्रान्ति (विवर्तन) के (सजीव) आप्ति (ग्रहण) से, जड़ पदार्थों में भी चित्त्व (चेतनता) का लाभ (होता है) — सर्व-चित् के क्षेप (प्रक्षेपण) से, (उनकी चित् के साथ) समता के कारण; और यहाँ इच्छा सर्वत्र ऐसी ही (व्यापक) है।