The Vision of Śiva· 7.32 / 122

The Vision of Śiva7.32

7.32
दृढांगुलिनिवेशेन दृढस्थूलनिरीक्षणात् । भ्रमतो भावचलनात् प्लवाच्च प्रेक्षणाक्षतेः ॥३२॥
dṛḍhāṃguliniveśena dṛḍhasthūlanirīkṣaṇāt | bhramato bhāvacalanāt plavācca prekṣaṇākṣateḥ
— दृढ़ अंगुलि-निवेश के द्वारा ; — दृढ़ स्थूल निरीक्षण से ; — घुमाते हुए (साधक) का ; — वस्तु के चलन से ; — प्लव (उछाल) से ; — और ; — प्रेक्षण की अक्षति (अविच्छिन्नता) से

दृढ़ अंगुलि-निवेश (अंगुलियों के दृढ़ रखने) के द्वारा, किसी स्थूल (वस्तु) पर दृढ़ स्थिर निरीक्षण से, उसे घुमाते समय (वस्तु के) चलन से, (उसके) प्लव (उछाल) से, तथा प्रेक्षण (दृष्टि) की अक्षति (अविच्छिन्नता) से (— ऐसी विधियाँ अग्रिम अनुभव उत्पन्न करती हैं)।