दृढांगुलिनिवेशेन दृढस्थूलनिरीक्षणात् ।
भ्रमतो भावचलनात् प्लवाच्च प्रेक्षणाक्षतेः ॥३२॥
dṛḍhāṃguliniveśena dṛḍhasthūlanirīkṣaṇāt |
bhramato bhāvacalanāt plavācca prekṣaṇākṣateḥ
दृढ़ अंगुलि-निवेश (अंगुलियों के दृढ़ रखने) के द्वारा, किसी स्थूल (वस्तु) पर दृढ़ स्थिर निरीक्षण से, उसे घुमाते समय (वस्तु के) चलन से, (उसके) प्लव (उछाल) से, तथा प्रेक्षण (दृष्टि) की अक्षति (अविच्छिन्नता) से (— ऐसी विधियाँ अग्रिम अनुभव उत्पन्न करती हैं)।