The Vision of Śiva· 7.28 / 122

The Vision of Śiva7.28

7.28
तस्यापि शक्तिर्मृत्पिण्डघटवद्विश्वतां गता । यावद्यावत्तरेद्विद्यामायादिघनपार्थिवम् ॥२८॥
tasyāpi śaktirmṛtpiṇḍaghaṭavadviśvatāṃ gatā | yāvadyāvattaredvidyāmāyādighanapārthivam
— उसकी भी ; — शक्ति ; — मृत्पिण्ड के घट बनने के समान ; — विश्वरूपता को प्राप्त ; — जहाँ तक ; — पार करे ; — विद्या, माया आदि के घन पार्थिव को

उसकी भी शक्ति, मृत्पिण्ड के घट बन जाने के समान, विश्वरूपता को प्राप्त हो गई है — जहाँ तक (साधक को) विद्या, माया आदि के घन (सघन) पार्थिव (भूतत्त्व) को पार करना (अपेक्षित) है (स्रोत तक पहुँचने के लिए)।