The Vision of Śiva· 7.27 / 122

The Vision of Śiva7.27

7.27
ततः स्थूलैर्मन्त्रमयैरङ्गैः सर्वक्रियापरा । भवतीश्वररूपेण स्वकार्याखिलरूपिणी ॥२७॥
tataḥ sthūlairmantramayairaṅgaiḥ sarvakriyāparā | bhavatīśvararūpeṇa svakāryākhilarūpiṇī
— तदनन्तर ; — स्थूल ; — मन्त्रमय ; — अंगों के द्वारा ; — समस्त क्रिया में परायण ; — हो जाती है ; — ईश्वर के रूप में ; — अपने समस्त कार्यों के रूप को धारण करती हुई

तदनन्तर, मन्त्रमय स्थूल अंगों के द्वारा (वह शक्ति) समस्त क्रिया में परायण हो जाती है — ईश्वर के रूप में, अपने समस्त कार्यों के रूप को धारण करती हुई।