तस्येच्छास्पन्दनं पूर्वन्यग्भावो ह्लादसंगमः ।
भूपभूपतिशक्त्याभमग्न्यं तत्पूर्णचिल्लयात् ॥१९॥
tasyecchāspandanaṃ pūrvanyagbhāvo hlādasaṃgamaḥ |
bhūpabhūpatiśaktyābhamagnyaṃ tatpūrṇacillayāt
उस (इच्छा) का इच्छा-स्पन्दन (इच्छारूप कम्पन) पूर्व-न्यग्भाव (प्रथम अन्तर्मुखी निमज्जन) तथा आह्लाद (आनन्द) के संगम वाला है; (वह) भूप (राजा) तथा भूपति-शक्ति के सादृश्य वाला, और अग्निमय (दीप्त) है, उस पूर्ण चित् में लय के कारण।