याति व्याप्तिं तथाभूतां शाम्यदामोदसत्क्रियाम् ।
शान्तानन्दवपुः स्वच्छ उररीकृतदृक्क्रियः ॥२०॥
yāti vyāptiṃ tathābhūtāṃ śāmyadāmodasatkriyām |
śāntānandavapuḥ svaccha urarīkṛtadṛkkriyaḥ
वह वैसे प्रकार की व्याप्ति को प्राप्त होता है, जिसकी सत् क्रिया (वास्तविक प्रवृत्ति) शाम्यमान (क्रमशः शान्त होता) आमोद (आनन्द) है; (वह) शान्त आनन्द-स्वरूप, स्वच्छ, तथा दृक् (दर्शन) और क्रिया (की शक्तियों) को अंगीकृत किए हुए हो जाता है।