मध्यव्योमशान्तबोधभरलब्धोदयः शिवः ।
तस्यापि विद्युदालोकवदभेदवती चला ॥२१॥
madhyavyomaśāntabodhabharalabdhodayaḥ śivaḥ |
tasyāpi vidyudālokavadabhedavatī calā
(यह) शिव है, जिसका उदय मध्य-व्योम (केन्द्रीय शून्य) में शान्त बोध के भार (पूर्णता) से प्राप्त होता है; और उसकी भी (शक्ति) विद्युत् के आलोक (बिजली की चमक) के समान अभेदवती (अभिन्न) तथा (फिर भी) चला (स्पन्दनशील) है।