The Vision of Śiva· 7.21 / 122

The Vision of Śiva7.21

7.21
मध्यव्योमशान्तबोधभरलब्धोदयः शिवः । तस्यापि विद्युदालोकवदभेदवती चला ॥२१॥
madhyavyomaśāntabodhabharalabdhodayaḥ śivaḥ | tasyāpi vidyudālokavadabhedavatī calā
— जिसका उदय मध्य-व्योम में शान्त बोध के भार से प्राप्त होता है ; — शिव ; — उसकी भी ; — विद्युत् के आलोक के समान ; — अभेदवती (अभिन्न) ; — चला (स्पन्दनशील)

(यह) शिव है, जिसका उदय मध्य-व्योम (केन्द्रीय शून्य) में शान्त बोध के भार (पूर्णता) से प्राप्त होता है; और उसकी भी (शक्ति) विद्युत् के आलोक (बिजली की चमक) के समान अभेदवती (अभिन्न) तथा (फिर भी) चला (स्पन्दनशील) है।