भाविस्वभेदतत्कृत्यज्ञानप्रौन्मुख्यवर्तिनी ।
निजभावकृतसृष्टितदनुग्रहचेतना ॥२२॥
bhāvisvabhedatatkṛtyajñānapraunmukhyavartinī |
nijabhāvakṛtasṛṣṭitadanugrahacetanā
(वह शक्ति) भावी आत्म-भेद तथा उसके कृत्यों के ज्ञान के प्रति प्रौन्मुख्य (तीव्र अभिमुखता) में स्थित है; (वह) अपने ही (स्वाभाविक) भाव से सृष्टि तथा उस (सृष्टि) पर अनुग्रह करने वाली चेतना है।