स्वानन्दैकरसाह्लादी स्वकार्यार्थशरीरवान् ।
तथास्थितस्य ध्यानेन बोधाद्वा तत्स्वरूपभाक् ॥१८॥
svānandaikarasāhlādī svakāryārthaśarīravān |
tathāsthitasya dhyānena bodhādvā tatsvarūpabhāk
(वह इच्छा) अपने आनन्द के एकरस आह्लाद वाली, तथा अपने कार्यभूत अर्थों (पदार्थों) को शरीर रूप में धारण करने वाली है; और इस प्रकार (उसमें) अवस्थित (साधक) ध्यान से अथवा (साक्षात्) बोध से उस स्वरूप का भागी हो जाता है।