The Vision of Śiva· 7.18 / 122

The Vision of Śiva7.18

7.18
स्वानन्दैकरसाह्लादी स्वकार्यार्थशरीरवान् । तथास्थितस्य ध्यानेन बोधाद्वा तत्स्वरूपभाक् ॥१८॥
svānandaikarasāhlādī svakāryārthaśarīravān | tathāsthitasya dhyānena bodhādvā tatsvarūpabhāk
— अपने आनन्द के एकरस आह्लाद वाली ; — अपने कार्यभूत अर्थों को शरीर रूप में धारण करने वाली ; — इस प्रकार अवस्थित (साधक) का ; — ध्यान से ; — अथवा बोध से ; — उस स्वरूप का भागी

(वह इच्छा) अपने आनन्द के एकरस आह्लाद वाली, तथा अपने कार्यभूत अर्थों (पदार्थों) को शरीर रूप में धारण करने वाली है; और इस प्रकार (उसमें) अवस्थित (साधक) ध्यान से अथवा (साक्षात्) बोध से उस स्वरूप का भागी हो जाता है।