The Vision of Śiva· 7.16 / 122

The Vision of Śiva7.16

7.16
नचापि केवलाद्द्रव्यात् किंचनापि प्रवर्तते । तस्मादित्थमिह ज्ञेयं शाक्तं रूपभेदवत् ॥१६॥
nacāpi kevalāddravyāt kiṃcanāpi pravartate | tasmāditthamiha jñeyaṃ śāktaṃ rūpabhedavat
— और न ही ; — केवल द्रव्य से ; — कुछ भी ; — प्रवृत्त होता है ; — इसलिए ; — इस प्रकार ; — यहाँ ; — ज्ञातव्य ; — शाक्त (शक्ति का क्षेत्र) ; — रूप-भेद वाला (किन्तु अभिन्न)

और न केवल द्रव्य (मात्र) से (अपनी शक्ति के बिना) कुछ भी प्रवृत्त होता है; इसलिए यहाँ शाक्त (शक्ति का क्षेत्र) इस प्रकार ज्ञातव्य है — (मात्र) रूप-भेद वाला (किन्तु अपने धारक से अभिन्न)।