The Vision of Śiva· 6.98 / 126

The Vision of Śiva6.98

6.98
अमूर्तत्वाद्यदि भवेदमूर्तत्वेऽपि वस्तुता । वस्तुत्वे संस्कारोत्येव नानासत्तानुयोगतः ॥९८॥
amūrtatvādyadi bhavedamūrtatve'pi vastutā | vastutve saṃskārotyeva nānāsattānuyogataḥ
— अमूर्तत्व के कारण ; — यदि (सम्भव) हो ; — अमूर्तत्व में भी ; — वस्तुता ; — वस्तुता होने पर ; — अवश्य (स्थान) अपेक्षित करता है ; — नाना सत्ताओं के अनुयोग से

यदि (उनकी सह-अवस्थिति) अमूर्तत्व के कारण (सम्भव हो) — (तो भी) अमूर्त में भी वस्तुता है; और वस्तुता होने पर वह (अपना स्थान) अवश्य (अपेक्षित करता) है, क्योंकि नाना सत्ताओं (अनेक विद्यमानों) का अनुयोग (सम्बन्ध) है (अतः आक्षेप वस्तुवादी पर बना रहता है)।