तदर्थमुक्तमीशेन न परार्थविवक्षया ।
अनेकेषामणूनां च कथमेकत्र संस्थितिः ॥९७॥
tadarthamuktamīśena na parārthavivakṣayā |
anekeṣāmaṇūnāṃ ca kathamekatra saṃsthitiḥ
उस (साधक के) प्रयोजन के लिए ईश्वर ने (वैसा) कहा है, न कि किसी (वस्तुतः) पर (भिन्न) मत के प्रतिपादन की इच्छा से। (अब अन्य आक्षेप:) और अनेक अणुओं की एक स्थान में संस्थिति (सह-अवस्थिति) कैसे (सम्भव है)?