The Vision of Śiva· 6.97 / 126

The Vision of Śiva6.97

6.97
तदर्थमुक्तमीशेन न परार्थविवक्षया । अनेकेषामणूनां च कथमेकत्र संस्थितिः ॥९७॥
tadarthamuktamīśena na parārthavivakṣayā | anekeṣāmaṇūnāṃ ca kathamekatra saṃsthitiḥ
— उसके (साधक के) प्रयोजन के लिए ; — कहा गया है ; — ईश्वर के द्वारा ; — न कि ; — पर (भिन्न) मत के प्रतिपादन की इच्छा से ; — अनेक अणुओं की ; — और (आक्षेप) ; — कैसे ; — एक स्थान में ; — संस्थिति (सह-अवस्थिति)

उस (साधक के) प्रयोजन के लिए ईश्वर ने (वैसा) कहा है, न कि किसी (वस्तुतः) पर (भिन्न) मत के प्रतिपादन की इच्छा से। (अब अन्य आक्षेप:) और अनेक अणुओं की एक स्थान में संस्थिति (सह-अवस्थिति) कैसे (सम्भव है)?