बन्धमोक्षाद्यभावेन निर्मलोऽत्र करोति किम् ।
नच वा प्रत्ययं गच्छेत् झटित्येकोक्तिमात्रतः ॥९६॥
bandhamokṣādyabhāvena nirmalo'tra karoti kim |
naca vā pratyayaṃ gacchet jhaṭityekoktimātrataḥ
(यदि आत्मा को) निर्मल (ही उपदिष्ट किया जाए), तो बन्ध, मोक्ष आदि के अभाव में वह यहाँ (किसी मार्ग के बिना) क्या करेगा? और एक ही बार के मात्र कथन से (कोई) झटिति (तत्काल) प्रत्यय (दृढ़ निश्चय) को नहीं प्राप्त करेगा (— अतः क्रमिक उपदेश सप्रयोजन है)।