अन्यथा ह्येकरूपत्वे विचिकित्सा प्रवर्तते ।
विना बोधं प्राथमिके निर्यत्नश्च भवेदसौ ॥९५॥
anyathā hyekarūpatve vicikitsā pravartate |
vinā bodhaṃ prāthamike niryatnaśca bhavedasau
क्योंकि अन्यथा, यदि (केवल) एकरूपता (ही उपदिष्ट हो), तो (क्रमिक) बोध के बिना प्राथमिक (साधक) में विचिकित्सा (संशय) प्रवृत्त होगी, और वह (साधक) निर्यत्न (साधना में प्रयत्नहीन) हो जाएगा (— अतः भेद और मल का प्रासंगिक उपदेश है)।