The Vision of Śiva· 6.86 / 126

The Vision of Śiva6.86

6.86
शून्यत्वे सति तस्याः स्यात्तस्माद्बौद्धमयुक्तिमत् । अन्यत्र युज्यतेऽपोहः शब्दार्थानामसंगमात् ॥८६॥
śūnyatve sati tasyāḥ syāttasmādbauddhamayuktimat | anyatra yujyate'pohaḥ śabdārthānāmasaṃgamāt
— शून्यता होने पर ; — उस (संवृति) की ; — होगी ; — इसलिए ; — बौद्ध (मत) ; — युक्तिरहित ; — अन्यत्र (हमारे मत में) ; — युक्तियुक्त होता है ; — अपोह ; — शब्दार्थों का ; — (केवल आभासमात्र) असंगम के कारण

यदि शून्यता (हो), तो उस (संवृति) को (यह) असंगति (अनिवार्यतः) प्राप्त होगी; इसलिए बौद्ध (मत) युक्तिरहित है। अन्यत्र (अर्थात् हमारे मत में) अपोह (की कल्पना किसी प्रकार) युक्तियुक्त होती है, क्योंकि शब्दार्थों का (केवल आभासमात्र) असंगम है (जिसे अन्तर्निहित एकता ही धारण करती है)।