शून्यत्वे सति युज्येत प्रमाणं वोपपद्यते ।
संवृत्यैव संवृतिर्हि निवार्या चेदसंगमः ॥८५॥
śūnyatve sati yujyeta pramāṇaṃ vopapadyate |
saṃvṛtyaiva saṃvṛtirhi nivāryā cedasaṃgamaḥ
यदि शून्यता (मान ली जाए), तो (कोई) प्रमाण क्या युक्तियुक्त (सिद्ध) होगा अथवा (किसी प्रकार) उपपन्न होगा? और यदि संवृति (व्यवहार) का निवारण संवृति के द्वारा ही (किया जाए), तो निश्चय ही असंगति (उत्पन्न होती है — व्यवहार अपने ही निरसन का आधार नहीं बन सकता)।