The Vision of Śiva· 6.87 / 126

The Vision of Śiva6.87

6.87
सर्वस्य सर्वभावत्वादिहासौ नोपपद्यते । चर्मोपमश्चेदित्यादि यद्बौद्धैः समुदाहृतम् ॥८७॥
sarvasya sarvabhāvatvādihāsau nopapadyate | carmopamaścedityādi yadbauddhaiḥ samudāhṛtam
— सबका ; — सब-भाव होने के कारण ; — यहाँ (हमारे लिए) ; — यह (अपोह) ; — उपपन्न नहीं होता ; — 'चर्म के समान' ; — यदि ; — इत्यादि ; — जो कुछ ; — बौद्धों के द्वारा ; — कहा गया है

(किन्तु अन्ततः) क्योंकि सब कुछ (वस्तुतः) सब कुछ ही है, अतः यह (अपोह) यहाँ (हमारे लिए भी) उपपन्न नहीं होता। और बौद्धों ने जो कुछ कहा है — 'चर्म के समान' इत्यादि (वे उपमाएँ आगे खण्डित होती हैं)।