The Vision of Śiva· 6.88 / 126

The Vision of Śiva6.88

6.88
सर्वत्र सर्वसंवित्तेस्तत्सर्वं विनिवारितम् । विकल्पा येऽपि चार्वाकैरुक्तास्तेऽपि न बाधकाः ॥८८॥
sarvatra sarvasaṃvittestatsarvaṃ vinivāritam | vikalpā ye'pi cārvākairuktāste'pi na bādhakāḥ
— सर्वत्र ; — सबमें सबकी संवित्ति के कारण ; — वह सब ; — निवारित हुआ ; — विकल्प (तर्क) ; — जो भी ; — चार्वाकों के द्वारा ; — कहे गए ; — वे भी ; — बाधक नहीं हैं

सर्वत्र, सबमें सबकी संवित्ति (अनुभूति) होने के कारण, वह सब (बौद्ध युक्ति) निवारित हो जाती है; और चार्वाकों के द्वारा जो विकल्प (तर्क) कहे गए हैं — वे भी (हमारे पक्ष के) बाधक नहीं हैं।