सर्वत्र सर्वसंवित्तेस्तत्सर्वं विनिवारितम् ।
विकल्पा येऽपि चार्वाकैरुक्तास्तेऽपि न बाधकाः ॥८८॥
sarvatra sarvasaṃvittestatsarvaṃ vinivāritam |
vikalpā ye'pi cārvākairuktāste'pi na bādhakāḥ
सर्वत्र, सबमें सबकी संवित्ति (अनुभूति) होने के कारण, वह सब (बौद्ध युक्ति) निवारित हो जाती है; और चार्वाकों के द्वारा जो विकल्प (तर्क) कहे गए हैं — वे भी (हमारे पक्ष के) बाधक नहीं हैं।